इसके लिए इतिहास में जाना होगा। 1765 में नेपाल में पृथ्वीनारायण शाह ने गोरखा साम्राज्य की स्थापना की। उन्हीं के नेतृत्व में गोरखों ने नेपाल के छोटे-छोटे राजे-रजवाड़ों और रियासतों को जीतकर मिला लिया।
उसके बाद 1790 में गोरखों ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया। चीन ने तिब्बत का साथ दिया और 1792 में गोरखों को संधि करने पर मजबूर कर दिया।
वहां से खदेड़ मिलने के बाद गोरखों ने भारत की ओर रुख किया। और 25 साल में ही गोरखों ने भारत से सटे राज्य, सिक्किम, गढ़वाल और कुमाऊं पर अपना नियंत्रण कर लिया।
उस समय भारत में अंग्रेजों का राज था। लिहाजा, ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच लड़ाई शुरू हो गई। ये लड़ाई 1814 से 1816 तक चली। इस लड़ाई में नेपाल को अपना दो-तिहाई हिस्सा खोना पड़ा। हालांकि, ये वही हिस्सा था जो नेपाल ने भारत से छीना था।
लड़ाई के बीच ही 2 दिसंबर 1815 को ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सुगौली संधि हुई। सुगौली एक शहर है जो बिहार के चंपारण में है। ये संधि यहीं पर हुई थी।
कंपनी की तरफ से इस संधि पर लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडश और नेपाल की ओर से राजगुरु गजराज मिश्र ने हस्ताक्षर किए। इस संधि पर हस्ताक्षर तो दिसंबर 1815 में हो गए थे, लेकिन ये संधि अमल में 4 मार्च 1816 से आई।
इस संधि के तहत नेपाल को सिक्किम, गढ़वाल और कुमाऊं से अपना नियंत्रण छोड़ना पड़ा। अंग्रेजों से लड़ाई से पहले तक नेपाल ने पश्चिम में सतलज नदी और पूरब में तीस्ता नदी तक खुद को फैला लिया था। लेकिन, बाद में ये पश्चिम में महाकाली और पूरब में मैची नदी तक सीमित हो गया।
